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राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव
Bureau | June 16, 2020 | 0 Comments

Politics of Tejaswi Yadav and Akhilesh Yadav in Bihar Vidhan Sabha Election 2020

क्या तेजस्वी और अखिलेश यादव राजनीति में वो कर पाएंगे जो लालू और मुलायम कर लेते थे?

बिहार विधानसभा चुनाव 2020: बीजेपी के सामने कहां है आरजेडी की तैयारी? क्या यूपी के मुद्दे उठा पा रहे हैं अखिलेश यादव

बिहार विधानसभा का चुनाव सिर पर आ गया है. यूपी का चुनाव भी अब नजदीक ही आ रहा है. दोनों राज्यों में बीजेपी (BJP) और कांग्रेस (Congress) के अलावा आरजेडी (RJD) और समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) की भूमिका अहम है. दोनों दलों के मुखिया लालू यादव और मुलायम लंबे समय तक सत्ता में रहे हैं. दोनों पिछड़ों खासतौर पर यादवों की राजनीति करते रहे हैं. दोनों ही परिवारों में अच्छा राजनीतिक माहौल रहा है लेकिन दोनों के बेटे सियासत में उनके जैसा मुकाम नहीं हासिल कर पाए.

तेजस्वी और अखिलेश दोनों को अपने-अपने राज्यों के विधानसभा चुनावों में एक बार फिर खुद को साबित करने का मौका है. लेकिन, बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अभी बीजेपी जैसी तैयारी आरजेडी की नहीं दिख रही है. सवाल ये है कि क्या ये दोनों युवा नेता अपने-अपने राज्यों में वो कर पाएंगे जो राजनीति में लालू और मुलायम कर लेते थे?

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक प्रो. एके वर्मा कहते हैं कि मुलायम (Mulayam Singh Yadav) और लालू दोनों जमीनी नेता हैं. दोनों संघर्ष से उपजे हैं. संयोग से दोनों किसी न किसी वजह से मेन स्ट्रीम से बाहर हैं. दिक्कत ये है कि इन दोनों के बेटों ने न संघर्ष किया है और न तो इनके पास संघर्ष करने की कोई योजना है. इनका न जनता से कनेक्ट है और न पार्टी कार्यकर्ताओं से जुड़ाव. इसलिए ये दोनों लालू और मुलायम नहीं बन पाएंगे. यूपी में मुद्दों की कमी नहीं है, लेकिन अखिलेश क्या किसी को ठीक से उठा पा रहे हैं?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और सामाजिक चिंतक सभाजीत यादव कहते हैं कि लालू यादव (Lalu Prasad Yadav) और मुलायम के किए का खामियाजा उनके बेटे भुगत रहे हैं. दोनों ओबीसी या सर्वसमाज का नेता बनने की जगह पहले सिर्फ यादवों के नेता बन गए और फिर धीरे-धीरे परिवार के नेता में तब्दील हो गए. सत्ता में रहकर ये लोग जो सोशल इंजीनियरिंग कर सकते थे वो नहीं किया. न तो पिछड़ों के लिए कोई नीतिगत फैसला किया. इसलिए इनकी पार्टियों से दूसरे समाज के लोग कटते चले गए. इन लोगों ने इतना डैमेज किया है कि उनके बेटे संभाल नहीं पा रहे हैं.

हालांकि, दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार डॉ. वर्मा और सभाजीत यादव के तर्क से इत्तफाक नहीं रखते. उनका कहना है कि भारत में प्रजातंत्र के प्रजातांत्रीकरण में इन दोनों नेताओं का बड़ा योगदान है. ये दोनों नेता जब अपने-अपने राज्य की सत्ता में आए थे तब ओबीसी (OBC) इतना मुखर नहीं था. इन दोनों की वजह से पिछड़े वर्ग के लोगों में आत्मविश्वास आया. लेकिन कोई ये सोचे कि अमिताभ बच्चन का बेटा अमिताभ बच्चन ही हो जाएगा ये ठीक नहीं.

परिस्थतियां ही मंजिल का निर्माण करती हैं. जब लालू और मुलायम राजनीति में आए थे तब उस समाज को कुछ और चाहिए था. उसे उन्होंने दबे-कुचले लोगों को दिया. लेकिन आज के हालात कुछ और हैं. आज सामाजिक के साथ-साथ इकोनॉमिक न्याय की लड़ाई है. इस लड़ाई को लड़ने के लिए जो भी नेता अपना विजन ठीक तरीके से जनता के सामने रखेगा वो सफल होगा. लालू और मुलायम को लंबे संघर्ष के बाद सत्ता मिली है. तेजस्वी और अखिलेश को भी लंबी लड़ाई लड़नी होगी. लेकिन किसी को भी उसके पिता के सांचे में रखना ठीक नहीं. यह फार्मूला किसी भी फील्ड में फिट नहीं बैठता.

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Author: Bureau

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