Blog

करुणानिधि
Bureau | August 7, 2018 | 0 Comments

DMK chief Muthuvel Karunanidhi story of rising in politics from glamour world

करुणानिधि
करुणानिधि

करुणानिधि के ग्‍लैमर वर्ल्‍ड से निकलकर राजनीति का बड़ा खिलाड़ी बनने की कहानी

दक्षिण भारत की राजनीति में एम करुणानिधि सिर्फ एक नाम ही नहीं है बल्कि हर खास और आम के लिए वह एक दमदार शख्सियत रहे हैं। इसको इत्तफाक ही कहा जाएगा कि तमिलनाडु की राजनीति में आने वाले तीन बड़े चेहरे न सिर्फ कभी ग्‍लैमर वर्ल्‍ड में एक साथ थे बल्कि तीनों ने ही राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल किया। इनमें एनटी रामाराव, जयललीता और खुद करुणानिधि का नाम आता है। रामाराव और जयललीता जहां फिल्‍मी पर्दे पर अपनी अदाकारी के जलवे बिखेरते दिखाई देते थे, वहीं करुणानिधि अपनी कलम का कमाल दिखाते थे। रामाराव और जयललीता की कई फिल्‍मों के लिए उन्‍होंने कहानी लिखी हैं। लेकिन ग्‍लैमर वर्ल्‍ड के बाहर ये एक दूसरे के खिलाफ ही नजर आए। बहरहाल, करुणानिधि का राजनीतिक जीवन भी अपने आप में किसी मिसाल से कम नहीं है।

लंबा राजनीतिक सफर

उनका 78 साल लंबा राजनीतिक जीवन काफी कुछ बयां करता है। इस दौरान उनकी धमक राज्‍य से लेकर केंद्र तक में सुनाई दी। तमिलनाडु के पूर्व मुख्‍यमंत्री करुणानिधि ने तमिलनाडु की राजनीति के साथ साथ देश की राजनीति को भी काफी प्रभावित किया है। गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन के साथ करुणानिधि का दिल्ली की राजनीति में प्रवेश हुआ था। वे तमिलनाडु में कांग्रेस-विरोध के ध्रुव के रूप में उभरे और अपनी एक अलग पहचान बनाई। उन्‍होंने महज 14 साल की उम्र में राजनीति और आंदोलन का ककहरा सीखा था। यह दौर था हिन्दी-विरोधी आंदोलन का। यही से उन्‍होंने अपने राजनीति करियर की शुरुआत की और फिर कभी पलट कर नहीं देखा।

यह बात और थी कि वह उस वक्‍त कतार में सबसे आखिरी में खड़े हुए एक आदमी थे। न सिर्फ हिंदु विरोधी आंदोलन बल्कि द्रविड आंदोलन के समय में भी करुणानिधि की भूमिका काफी अहम रही। यह आंदोलन रामामी पेरियार ने समाज में व्याप्त जाति और लिंग आधारित भेदभाव के खिलाफ शुरू किया था। करुणानिधि ने इस आंदोलन को अपनी फिल्मों व राजनीति के माध्यम से आगे बढ़ाया। यह भी इत्‍तफाक ही है कि आज जिस मिड डे मील योजना को हम देखते हैं उसकी शुरुआत का श्रेय भी इसी आंदोलन को जाता है।

पहली बार मिली तमिलनाडु में सत्ता

1967 के बाद से तमिलनाडु की राजनीति एआईएडीएमके और डीएमके के बीच विभाजित रही। कांग्रेस तमिलनाडु में इन दोनों के बीच कोई मजबूत विकल्‍प कभी नहीं बन पाई। 1969 में करुणानिधि पहली बार तमिलनाडु की सत्‍ता पर काबिज हुए। हालांकि उनका राजनीतिक जीवन कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। इमरजेंसी के बाद 1977 में करुणानिधि की डीएमके ने केंद्र में मौजूद जनता पार्टी का साथ दिया। इसी वक्‍त एआईएडीएमके विपक्ष में कांग्रेस के साथ खड़ी थी। उस वक्‍त डीएमके सीटों के लिहाज से एआईएडीएमके से कहीं पीछे खड़ी थी। डीएमके को उस वक्‍त महज एक सीट और एआईएडीएमके को 19 सीटें मिली थीं।

वीपी सिंह को पीएम बनाने में अहम रोल

करुणानिधि की दमदार शख्सियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1989 में वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाने में चौधरी देवीलाल के साथ मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह सब कुछ तब था जब इस चुनाव में उनकी पार्टी को कोई सीट नहीं मिल सकी थी। इसके बाद भी उन्‍होंने संसदीय दल की बैठक में देवीलाल को प्रधानमंत्री के लिए चुना था। लेकिन देवीलाल ने यह पद अस्‍वीकार करते हुए वीपी सिंह को नेता बनाने का प्रस्ताव पेश किया था जिसका बाद में करुणानिधि ने खुलकर समर्थन किया था। मंडल आयोम की रिपोर्ट को लागू करवाने में भी करुणानिधि की भूमिका काफी अहम थी। आपको बता दें कि तमिलनाडु में अन्नादुराई के जमाने से पिछड़ों को आरक्षण मिला है। हालांकि यह सरकार ज्‍यादा लंबी नहीं चली और गिर गई।

1991 का लोकसभा चुनाव

लोकसभा चुनाव में लगातार दूसरी बार 1991 में डीएमके अपना खाता तक नहीं खोल सकी थी। इसी दौरान पार्टी को तमिलनाडु में जयललीता के हाथों करारी हार मिली थी और वो सत्ता से बाहर हो गई थी। यह दौर पार्टी के लिए काफी मुश्किलों भरा था। ऐसा इसलिए क्‍योंकि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तमिलनाडु में एलटीटीई के हाथों हत्‍या करवा दी गई थी। तत्‍कालीन नरसिंहराव की सरकार के मंत्री अर्जुन सिंह ने खुलकर डीएमके नेताओं पर इस हत्‍या में शामिल होने और इसका षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया था। लेकिन करुणानिधि ने इसके बाद भी हार नहीं मानी और आरोपों का जबरदस्‍त बचाव किया और अपनी पार्टी का पक्ष मजबूती से रखा। यही वजह थी कि जो पार्टी बीते दो लोकसभा चुनाव में अपना खाता तक नहीं खोल सकी थी उसने 1996 के लोकसभा चुनाव में 17 सीटें हासिल की।

वहीं उसकी सहयोगी तमिल मनीला कांग्रेस को 20 सीटें मिली थीं। ऐसे में करुणानिधि का कद राजनीति में और बढ़ चुका था। इस वक्‍त भी करुणानिधि वीपी सिंह को पीएम बनाना चाहते थे, लेकिन इसके लिए वीपी सिंह तैयार नहीं हुए। इसके बाद उन्‍होंने पीएम के तौर पर एचडी देवेगौड़ा को चुना था। देवेगौड़ा के बाद उन्‍होंने इंद्रकुमार गुजराल को पीएम बनाने में अहम भूमिका निभाई।

अटल बिहारी वाजेपयी सरकार

1998 में एआईएडीएमके के समर्थन वापस लेने से अटल बिहारी वाजेपयी की सरकार गिर गई। 1999 में डीएमके एनडीए का हिस्सा बनी। 2004 के लोकसभा चुनाव के पहले ही डीएमके ने एनडीए का साथ छोड दिया और यूपीए का गठन करने में अहम भूमिका निभाई। मनमोहन सरकार में करुणानिधि का दबदबा पहले से कहीं अधिक था। उनके पार्टी सांसदों को उनकी पसंद के मंत्रालय दिलवाने में करुणानिधि की अहम भूमिका थी। इस दौर में एक बार फिर करुणानिधि के सामने मुश्किलें आनी शुरू हुई जब 2जी घोटाला मामले में डीएमके सांसद और केंद्रीय मंत्री ए राजा और खुद करुणिानिधि की बेटी कनिमोझी को जेल तक जाना पड़ा। यही वो दौर था जब डीएमके प्रमुख करुणानिधि के मन में कांग्रेस को लेकर काफी घृणा की भावना दिखाई दी।

कम नहीं हुई करुणानिधि की सक्रियता

बीते लोकसभा चुनाव और तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में भी करुणानिधि की सक्रियता कम नहीं हुई। जयललीता से छत्‍तीस का आंकड़ा रखने वाले करुणानिधि ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करके हुए कहा कि उनका नाम हमेशा लोगों के बीच रहेगा। उन्‍होंने कहा था कि इसमें कोई दोराय नहीं है कि जयललिता ने पार्टी के भविष्य और बेहतरी के लिए कड़े फैसले लिए। हालांकि कम उम्र में उनका निधन हो गया है लेकिन उनका नाम और शोहरत हमेशा बरकरार रहेगी। इसको इत्तफाक ही कहा जाएगा कि जिस वक्‍त जयललीता अस्‍पताल में थीं उसी वक्‍त से करुणानिधि की भी हालत खराब है। तब से लेकर आज तक करीब डेढ़ वर्ष से अधिक गुजर चुका है करुणानिधि की सेहत लगातार गिरती ही चली गई। हाल ही में कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी और उपराष्‍ट्रपति भी उनका हालचाल जानने अस्‍पताल गए थे।

करुणानिधि का निधन, पीएम मोदी ने जताया शोक, नहीं थम रहे समर्थकों के आंसू

द्रमुक अध्यक्ष एम करुणानिधि नहीं रहे। कावेरी अस्पताल में पिछले दस दिन से डाक्टरों के लिए उनके महत्वपूर्ण अंगों की कार्यक्षमता को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा था। उनकी तबीयत ज्यादा खराब होने को लेकर अस्पताल द्वारा जारी बयान के बाद बड़ी संख्या में पार्टी समर्थक अस्पताल के बाहर एकत्र हो गए थे। बहुतों को रोते हुए भी देखा गया। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक जताते हुए परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।

कावेरी अस्पताल प्रशासन ने बताया कि तमाम कोशिशों के बावजूद हम उन्हें नहीं बचा पाए। करुणानिधि ने मंगलवार की शाम 6 बजकर 10 मिनट पर अपनी अंतिम सांस ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करुणानिधि के निधन पर दुख जाहिर करते हुए कहा- वे देश के वरिष्ठतम नेता थे।

करुणानिधि 6 दशक तक राजनीति में रहे सक्रिय

द्रविड़ आंदोलन की उपज एम करुणानिधि अपने करीब 6 दशकों के राजनीतिक करियर में ज्यादातर समय राज्‍य की सियासत का एक ध्रुव बने रहे। वह 50 साल तक अपनी पार्टी डीएमके के अध्यक्ष रहे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी एम करुणानिधि तमिल भाषा पर अच्‍छी पकड़ रखते थे। उन्‍होंने कई किताबें, उपन्‍यास, नाटकों और तमिल फिल्‍मों के लिए संवाद लिखे। तमिल सिनेमा से राजनीति में कदम रखने वाले करुणानिधि करीब छह दशकों के अपने राजनीतिक जीवन में एक भी चुनाव नहीं हारे। करुणानिधि के समर्थक उन्हें प्यार से ‘कलाईनार’ यानी ‘कला का विद्वान’ कहते हैं।

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन से पीड़ित थे

करुणानिधि यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन और बुढ़ापे में होने वाली कई बीमारियों से पीड़‍ित थे। करुणानिधि के ब्‍लड प्रेशर में गिरावट आने के कारण 28 जुलाई को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुरुआती इलाज के बाद उनका ब्‍लड प्रेशर कंट्रोल में कर लिया गया था। शनिवार रात को हॉस्पिटल ने एक बयान जारी कर कहा था कि करुणानिधि के स्‍वास्‍थ्‍य को ‘अस्‍थाई झटका’ लगा है।

इस बीच सोमवार को करुणानिधि की तबीयत और ज्‍यादा खराब हो गई। मंगलवार शाम को जारी अपने बयान में कावेरी अस्‍पताल ने कहा था कि पिछले कुछ घंटों में एम करुणानिधि की हालत में काफी गिरावट आई है। पूरे मेडिकल सपॉर्ट के बाद भी उनके अंगों के काम करने की गति कम होती जा रही है। उनकी स्थिति बहुत ही नाजुक और अस्थिर बनी हुई है।’ देर शाम को हॉस्पिटल ने करुणानिधि के निधन की घोषणा कर दी। हॉस्पिटल ने बताया कि करुणानिधि का शाम 6:10 पर निधन हो गया।

दक्षिण की राजनीति के भीष्‍म पितामह थे करुणानिधि, निधन पर जानिये किसने क्‍या कहा

दक्षिण भारत की राजनीति के भीष्‍म पितामह एम करुणानिधि का मंगलवार शाम निधन हो गया। उनके निधन के बाद डीएमके समर्थकों में शोक की लहर है। अपने चहेते नेता के अंतिम दर्शनों के लिए कावेरी अस्‍पताल के बाहर लोगों का हुजूम जुटा हुआ है। हर कोई अपने चहेते नेता के दर्शन करना चाहता है। करुणानिधि की 70 वर्षों से अधिक की राजनीतिक यात्रा में तमिलनाडु की राजनीति के साथ-साथ केंद्र की राजनीति भी साथ जुड़ी रही।

पीएम मोदी ने उस फोटो को ट्वीट किया है जिसमें वह करुणानिधि का हालचाल ले रहे थे। अपने संदेश में उन्‍होंने लिखा है कि इस समय वह उनके परिवार और उनके समर्थकों के साथ खड़े हैं। भगवान उनकी आत्‍मा को शांति दे। इसके अलावा उन्‍होंने तमिल भाषा में भी कई ट्वीट किए हैं। अपने दूसरे ट्वीट में उन्‍होंने लिखा है कि उन्‍हें भी करुणानिधि से मिलने का कई बार मौका मिला था। इस दौरान उन्‍होंने भी उनसे काफी कुछ सीखा। उनके सोशल वेलफेयर को लेकन नीतियां काबिले तारीफ थीं। इमरजेंसी के दौरान उनके किए कार्य हमेशा याद किए जाते रहेंगे। उनका योगदान सिर्फ तमिलनाडु के विकास में ही नहीं बल्कि भारत के विकास में भी अतुलनीय है। उन्‍होंने लिखा है कि वह भारत के सबसे वयोवृद्ध नेताओं में से एक थे। उनके निधन पर वह काफी दुखी हैं। व‍ह हमेशा ही जमीन से जुड़े नेता रहे और गरीबों के हक की लड़ाई लड़ते रहे।

उपराष्‍ट्रपति वेंकैया नायडू ने ट्वीट किया है कि वह करुणानिधि के निधन से काफी दुखी हैं। वह 80 वर्षों तक सामाजिक और राजनीतिक जीवन से जुड़े रहे। इसके अलावा 56 वर्षों तक वह तमिलनाडु विधानसभा के सदस्‍य रहे। उनका राजनीतिक जीवन और भारतीय राजनीति में अतुलनीय योगदान रहा है।

पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने संदेश में लिखा है कि उन्‍हें करुणानिधि के निधन से गहरा धक्‍का लगा है। करुणानिधि पांच बार तमिलनाडु के मुख्‍यमंत्री रहे और करीब साठ वर्षों तक तमिलनाडु की विधानसभा के सदस्‍य रहे। वह न सिर्फ तमिलनाडु बल्कि केंद्र की राजनीति में एक मजबूत स्‍तंभ की तरह थे। वह राज्‍य और केंद्र की राजनीति में हमेशा सक्रिय नेता रहे। ऐसे बेहद कम नेता होते हैं। वह हमेशा याद रहेंगे।

कांग्रेस ने अपने ट्वीट में उन्‍हें एक डायनामिक लीडर बताया है। इस संदेश में लिखा है कि सच्‍चे मायने में हमारे लोकतंत्र को दर्शाते थे। वो एक ऐसी शख्सियत थे जो जीवनभर बिना रुके और बिना थके तमिलनाडु के लोगों के लिए काम करते रहे। ये देश उन्‍हें कभी नहीं भूल सकेगा।

राहुल गांधी ने अपने ट्वीट में लिखा है कि उन्‍हें तमिलनाडु की जनता बेहद प्‍यार करती थी। वहां के लोगों में उनकी छवि काफी बड़ी थी। वह तमिलनाडु की राजनीति में बड़ी हस्‍ती थे, जो छह दशक से सक्रिय बने रहे। उनके निधन से भारत को जबरदस्‍त नुकसान हुआ है।

अखिलेश यादव ने ट्वीट किया है कि उनके निधन देश के लिए जबरदस्‍त नुकसान की तरह है। इस मौके पर वह शोकाकुल परिजनों के साथ हैं। भगवान उनकी आत्‍मा को शांति दे।

राजनाथ सिंह ने अपने संदेश में लिखा है कि करुणानिधि ने अपना पूरा जीवन जरुरतमंदों और गरीबों की सेवा में लगा दिया। उनकी आवाज ने समाज को एकजुट करने का काम किया। उनका निधन देश के लिए अपूर्णीय क्षति है।

राज्‍यवर्धन राठौड़ ने लिखा है कि करुणानिधि के निधन से काफी दुखी हैं। वह एक ग्रेट एडमिनिस्‍ट्रेटर और जमीन से जुड़े नेता थे, जिन्‍होंने अपना पूरा जीवन तमिलनाडु के लोगों के उत्‍थान के लिए लगा दिया। भगवान उनकी आत्‍मा को शांति दे और उनके परिवार को इस दुख से उबरने की शक्ति प्रदान करे।

केन जस्‍टर ने यूएस मिशन की तरफ से ट्वीट कर करुणानिधि के निधन पर शोक व्‍यक्‍त किया है। उन्‍होंने लिखा है कि उनकी संवेदनाएं करुणानिधि के परिवार और उनके समर्थकों के साथ हैं। उन्‍होंने ये भी लिखा है कि वह सामाजिक कार्यों के लिए वर्षों तक जाने जाएंगे।

स्‍मृति इरानी ने अपने संदेश में लिखा है कि करुणानिधि के निधन पर वह शोकाकुल परिवार और उनके समर्थकों के साथ हैं।

मुत्तुवेल करुणानिधिः स्क्रिप्ट राइटर से सीएम तक का सफर

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके चीफ एम करुणानिधि का मंगलवार को निधन हो गया। दक्षिण ही नहीं पूरे भारत में करुणानिधि का राजनीतिक कद बहुत बड़ा था। वे पांच बार तक तमिलनाडू के मुख्यमंत्री रहे। इसके अलावा वे अपनी सीट से कभी नहीं हारे। आइये जानते हैं एम करुणानिधि के जीवन से जुड़ी खास बातें।

बचपन से ही राजनीति में रुचि

मुत्तेवेल करुणानिधि का जन्म 3 जून 1924 को नागपट्टिनम के तिरुक्कुभलइ में हुआ था। पहले उनका नाम दक्षिणमूर्ति था जिसे बाद में बदलकर उन्होंने मुत्तुवेल करुणानिधि कर लिया। करुणानिधि इसाई वेल्लालर समुदाय से संबंध रखते थे। करुणानिधि की बचपन से ही राजनीति में रूचि थी। बताया जाता है कि उन्होंने 14 वर्ष की उम्र में ही हिंदी विरोधी आंदोलन में भाग लिया था। लेकिन करुणानिधि को पढ़ने का भी शौक था और उनके इसी शौक ने उन्हें फिल्म और साहित्य जगत में बड़ा नाम दिया। जिसके बाद वे राजनीति में भी एक लंबी और यादगार पारी खेल सके।

स्क्रिप्ट राइटर से शुरू किया करियर

करुणानिधि ने 20 साल की उम्र से अपना करियर फिल्मों के स्क्रिप्ट राइटर के तौर पर शुरू किया था। उन्हें समाजवादी और बुद्धिवादी आदर्शों को बढ़ावा देने वाली समाज सुधार कहानियां लिखने के लिए जाना जाता था। बताया जाता है कि करुणानिधि घोर नास्तिक थे और वे कई बार सार्वजनिक मंच से भी ये बात बोल चुके थे।

पहली फिल्म

उनकी पहली फिल्म ‘राजकुमारी’ थी, जिसे काफी लोकप्रियता मिली। इसके बाद पटकथा लेखक के रूप में उनकी काफी सराहना की गई। करुणानिधि ने अपने फिल्मी करियर में करीब 75 पटकथाएं लिखीं। जिनमें ‘राजकुमारी’, ‘अभिमन्यु’, ‘मंदिरी कुमारी’, ‘मरुद नाट्टू इलवरसी’, ‘मनामगन’, ‘देवकी’ समेत कई फिल्में शामिल हैं।

पराशक्ति से मिली सफलता

करुणानिधि को बड़ी सफलता ‘पराशक्ति’ नामक फिल्म के माध्यम से मिली। इसी के बाद से उन्होंने अपने राजनीतिक विचारों का प्रचार करना शुरू किया। ‘पराशक्ति’ तमिल सिनेमा जगत के लिए काफी असरदार साबित हुई। फिल्म में द्रविड़ आंदोलन की विचारधाराओं का समर्थन किया गया। हालांकि शुरू में इस फिल्म पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था लेकिन बाद में इसे 1952 में रिलीज कर दिया गया। यह बॉक्स ऑफिस पर एक बहुत बड़ी हिट फिल्म साबित हुई।

साहित्य में योगदान

करुणानिधि का तामिल साहित्य में काफी योगदान है। उन्होंने फिल्मी पटकथाओं के अलावा कविताएं, चिट्ठियां, उपन्यास, जीवनी, ऐतिहासिक उपन्यास, मंच नाटक, संवाद, गाने भी लिखे हैं। उन्होंने तिरुक्कुरल, थोल्काप्पिया पूंगा, पूम्बुकर के लिए कुरालोवियम के साथ-साथ कई कविताएं, निबंध और किताबें लिखी हैं। इसके अलावा उन्होंने नाटक भी लिखे।

करुणानिधि ने मनिमागुडम, ओरे रदम, पालानीअप्पन, तुक्कु मेडइ, कागिदप्पू, नाने एरिवाली, वेल्लिक्किलमई, उद्यासूरियन और सिलप्पदिकारम जैसे तमाम नाटक लिखे हैं। उन्होंने विश्व शास्त्रीय तमिल सम्मलेन 2010 के लिए आधिकारिक विषय गीत “सेम्मोज्हियाना तमिज्ह मोज्हियाम” लिखा जिसे उनके अनुरोध पर ए. आर. रहमान ने म्यूजिक दिया था।

Bureau
Author: Bureau

musingindia.com is a leading company in Hindi / English online space. musingindia.com is a leading company in Hindi/English online space. Launched in 2013, musingindia.com is the fastest growing Hindi/English news website in India, and focuses on delivering around the clock national and international news and analysis, business, sports, technology entertainment, lifestyle and astrology. As per Google Analytics, musingindia.com gets 10,000 Unique Visitors every month.

Facebooktwitterredditpinterestlinkedinmail

Bureau

musingindia.com is a leading company in Hindi / English online space. musingindia.com is a leading company in Hindi/English online space. Launched in 2013, musingindia.com is the fastest growing Hindi/English news website in India, and focuses on delivering around the clock national and international news and analysis, business, sports, technology entertainment, lifestyle and astrology. As per Google Analytics, musingindia.com gets 10,000 Unique Visitors every month.

Related Posts

Leave a Comment

Your email address will not be published.