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Many medicines are not available in the Pradhan Mantri Janushadhi Centers in Uttar Pradesh

मोदी सरकार में छोड़ दीज‍िए प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र से उम्मीद…न पर्याप्‍त दवाएं हैं और न ही सर्ज‍िकल सामान

सबके दर्द एक जैसे हैैं, लेकिन सिस्टम में इलाज की उम्मीद नहीं नजर आ रही। लोगों को सस्ते दर पर दवाएं व सर्जिकल सामान उपलब्ध कराने के लिए प्रदेश के सभी जिलों में प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र खोले गए थे, जहां उन्हें जेनेरिक दवाएं मिलतीं, लेकिन लोग अब भी मेडिकल स्टोर्स से महंगी दवा ही खरीदने को मजबूर हैैं। यहां तक कि राजधानी लखनऊ में ही सूची की लगभग चार सौ दवाएं केंद्रों से गायब हैैं। यहां के 12 केंद्रों का हाल यह है कि शुगर की ग्लाइकोमेट, नाइट्रोलांग दवा भी कई दिनों से नहीं है।

कारण क्या है? क्या डाक्टरों का काकस नहीं तोड़ा जा सका? या फिर सरकारी सिस्टम में झोल? जवाब यह है कि दोनों ही कारण हैैं। कानपुर के लोग बताते हैैं कि हैलट का जन औषधि केंद्र आठ घंटे ही खुल जाए तो बहुत। कोई भी केंद्र 24 घंटे नहीं खुलता। यही हाल फर्रुखाबाद, कानपुर, उन्नाव समेत बुंदेलखंड में आने वाले जिलों का है। इटावा, औरैया भी इससे अछूते नहीं।

बरेली मंडल के चारों जिलों में भी यही स्थिति है। मरीजों को जेनरिक दवाओं के बजाय प्राइवेट मेडिकल स्टोर से ही महंगी अंग्रेजी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। बदायूं के जिला महिला अस्पताल का केंद्र तो दवाओं के अभाव में बंद ही हो चुका है। मुरादाबाद में 26 दिन में सिर्फ 13 हजार 315 रुपये की ही दवा बिक पाई है। महाराज विनायक सोसायटी की निदेशक अलका सिंह ने बताया कि जैनरिक दवाइयों की डिमांड भेजी जा रही है। डिमांड के मुताबिक दवाइयां नहीं मिल पा रही हैं।

प्रयागराज में एसआरएन अस्पताल में जिले का सबसे पहला औषधि केंद्र खुला, लेकिन यहां डॉक्टर अगर पांच दवा लिखते हैं तो एक या दो ही केंद्र पर मिल पाती है, बाकी दवाएं बाहर से लेनी पड़ती हैं। अलीगढ़, आगरा, मैनपुरी, फीरोजाबाद, मथुरा, एटा और कासगंज सबकी बीमारी एक जैसी है, दवाएं न मिल पाना।

मेरठ में लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज व पीएल शर्मा जिला अस्पताल में जन औषधि केंद्र हैं, लेकिन शुगर, हार्ट, बीपी की दवाओं का घोर संकट है। बागपत के बड़ौत का एक जन औषधि केंद्र तो बंद हो चुका है। वाराणसी शहर मेंं खुले एक दर्जन ऐसे केंद्रों में चार सरकारी बड़े अस्पतालों में हैैं। इनमें मधुमेह, ह्रदय रोग, थायरायड और अस्थि रोग के मरीज महीनों से लगातार लौटाए जा रहे हैैं। यही हाल सोनभद्र, गाजीपुर, भदोही, जौनपुर आदि जनपदों का है।

जितना ऑर्डर उतनी आपूर्ति नहीं

एमडी ब्रेन पावर रविंद्र सिंह (आगरा मंडल में केंद्र संचालित करने वाली एजेंसी) नेे बताया क‍ि अधिकांश पर्चों पर दवाओं का ब्रांड नाम लिखा होता है, इससे परेशानी हो रही है। जितने ऑर्डर दिए जा रहे हैं, उस हिसाब से दवाओं की आपूर्ति नहीं हो रही है। डॉक्टर भी जेनेरिक दवाइयां नहीं लिख रहे हैं।

दवाएं न होने की होगी जांच

प्रमुख सचिव-चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण देवेश चतुर्वेदी ने कहा क‍ि जन औषधि केंद्रों में दवाएं न होने की जांच कराई जाएगी। हालांकि इन केंद्रों के संचालन की जिम्मेदारी निजी लोगों को दी गई है, लेकिन अधिकांश सरकारी अस्पतालों में खुले हैैं, इसलिए सख्त कदम उठाए जाएंगे। जांच की जाएगी कि केंद्रों की बाहरी दवा विक्रेताओं से साठ-गांठ तो नहीं है।

कहां क‍ितनी दवाएं उपलब्‍ध

  • लखनऊ : 700 दवाओं का दावा, 300 ही मौजूद
  • गोरखपुर : 36 केंद्र हैैं सरकारी रिकार्ड में, महज 15 संचालित
  • कानपुर : किसी भी केंद्र में महंगी जेनेरिक दवाओं के ब्रांड नहीं
  • बरेली : पैरासीटामाल और बीपी की दवाएं भी नहीं मिल रहीं
  • मुरादाबाद : फार्मासिस्ट को एक साल से वेतन नहीं
  • प्रयागराज : केंद्रों पर महज 20 फीसद दवाएं ही मौजूद
  • अलीगढ़ : सूची में 100 से अधिक सर्जिकल सामान, अधिकांश नदारद
  • आगरा : दवाएं अस्पताल के बाहर मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध
  • मेरठ : मनपसंद ब्रांड की दवाएं लिखने के डाक्टर आदी
  • वाराणसी : थायरायड और मल्टीविटामिन तक का स्टाक खाली
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