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Coronavirus lockdown: Labour pain infection worry keeps attendance low across sectors

लॉकडाउनः कोरोना से लड़ें या भूख से, इसलिए पैदल ही चल पड़े

लॉकडाउन के बाद पिछले तीन दिनों से लोगों का पैदल ही घर की ओर पलायन जारी है। हालांकि, कुछ जगहों पर पुलिस द्वारा लोगों को बॉर्डर तक छोड़ने के लिए ट्रक की व्यवस्था भी नजर आई।

शुक्रवार से उत्तर प्रदेश की सीमा को सील कर दिया गया है, ऐसे में अब दिल्ली से यूपी में प्रवेश करना और भी मुश्किल हो गया है। केवल जरूरी सेवा में लगे वाहनों को ही प्रवेश दिया जा रहा है। वहीं, लोगों के पलायन पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि किसी को भी दिल्ली से जाने की जरूरत नहीं है। सरकार ने सभी के भोजन के लिए व्यवस्था कर रखी है। ऐसे में लोग धैर्य रख अपने घरों में ही रहें।

राजधानी के विभिन्न इलाकों में इस तरह की तस्वीरें देखी जा सकती हैं जहां लोग सड़कों पर पैदल ही अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं। इसमें बड़ी संख्या में वे लोग हैं जो प्रतिदिन मजदूरी कर अपने घर का खर्च चलाते थे। यहां यह लोग किराए पर रहकर गुजर बसर कर रहे थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद इनके आगे रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। इस कारण यह लोग अपने-अपने गांव की ओर पैदल ही रुख कर रहे हैं।

इसमें कोई हरदोई तो कोई कानपुर, एटा आगरा, भिवानी, दरभंगा व समस्तीपुर का रहने वाला है। लोगों का कहना है कि जब से लॉकडाउन हुआ है तब से खाने की चिंता सता रही है। अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि हालात कब तक सुधरेंगे। गांव पहुंचने के बाद कम से कम रहने और खाने-पीने का संकट तो नहीं रहेगा।

बारिश के बीच सड़क पर लोगों का रेला

वहीं, शुक्रवार शाम को सड़कों पर यह स्थिति थी कि 200-300 लोग साथ चल रहे थे। इसमें हर उम्र वर्ग के लोग शामिल थे। किसी को नहीं मालूम था कि वे अपने घर बिना किसी साधन के कैसे जाएंगे। सिर पर सामान रखकर बस पैदल चलते जा रहे थे। बारिश भी उनके कदमों को रोक नहीं पाई। उत्तर प्रदेश के लिए अधिकतर गाडि़यां आनंद विहार से चलती हैं। ऐसे में दिल्ली से पलायन करने वाले लोग विभिन्न रास्तों से गुजरते हुए पैदल ही आनंद विहार बस अड्डा और एनएच-9 पर पहुंचे।

एनएच-9 पर दिख रही भीड़ ही भीड़

एनएच-9 पर दिल्ली-यूपी गेट पर तो पलायन करने वालों का सैलाब था। बॉर्डर पर पुलिस भी तैनात थी, लेकिन उसके बाद भी वह इन लोगों को रोक नहीं सकी। दिल्ली में जो डीटीसी की बसें चल रही हैं, वे डॉक्टरों, मीडियाकर्मियों, निगम और पुलिस के कर्मियों के लिए चल रही हैं। पलायन करने वाले बसों को रोकने की कोशिश करते, लेकिन चालक बसें रोकते और अपनी मजबूरी बताकर बस ले जाते। कोई दूसरा साधन भी उपलब्ध न होने की वजह से वे पैदल ही अपने घरों की ओर चलते रहे।

लॉकडाउन: दिल्ली से घर को निकले मजदूरों ने बताया दर्द- कोरोना से बाद में मरते, भूख से पहले मर जाते, इसलिए पैदल ही चल पड़े

कोरोना संकट के बीच बंदी के चलते दिल्ली में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले हजारों लोग पैदल ही अपने घरों की ओर रवाना हो गए हैं। दिल्ली से शाहजहांपुर जाने के लिए पैदल निकले 12 युवकों का जत्था बरेली होकर गुजरा तो अपनी पीड़ा बयां की। उन्होंने कहा कि दिल्ली बंद है और मकान मालिक भी वहां रहने नहीं दे रहे।

एक मजदूर ने बताया कि उनके घर में मां भी बीमार है, इसलिए वो पैदल ही निकल आए। हालांकि रास्ते में उन्हें जगह-जगह लोगों ने खाने पीने का सामान दिया। पुलिस ने भी बीच-बीच में उनका सहयोग किया। दिल्ली से पैदल चलकर आने वाले अशफाक ने बताया कि दिल्ली में बंदी के बाद कोई काम नहीं था। वह जिस दुकान में सिलाई करते हैं, वहां उन्हें रोजाना के हिसाब से पैसे मिलते थे। पिछले कुछ दिनों से काम बंद है तो पैसे नहीं मिले। मकान मालिक ने भी उन्हें घर से जाने को कह दिया।

उधर, दिल्ली से अपने घर शाहजहांपुर आने के लिए उन्हें कोई साधन भी नहीं मिला तो वह और उनके 11 अन्य साथी पैदल ही वहां से चल दिए। उन्होंने कहा कि दिल्ली में रहते तो कोरोना से बाद में, भूख से पहले मर जाते। ऐसे में उन्हें किसी भी तरह घर पहुंचना ही उचित लगा।

आमिर ने बताया कि दिल्ली में कोई परिवहन का साधन नहीं मिल रहा है। ऐसे में वे लोग पहले रेल की पटरियों के रास्ते और बाद में हाईवे पर चलके अपने घर को आने लगे। बीच में कहीं-कहीं कोई वाहन मिल जाता था तो वे सभी उस पर सवार हो जाते थे। इसके बाद फिर पैदल चलने लगते।

वहीं, सादाब ने बताया कि रास्ते में उन्हें लोगों ने बहुत सहयोग किया। सड़क के किनारे लोगों ने उन्हें खाने के पैकेट दिए। पुलिस भी जगह-जगह उनकी मदद करती रही। बरेली में आने पर भी यहां की लोकल पुलिस ने उन्हें खाने के पैकेट दिए। अब वह थोड़ा आराम कर दोबारा अपने घर की ओर निकल पड़े हैं। इस दौरान उन लोगों के पांवों के छाले और शरीर की थकान पीड़ा की गहराई को बयां कर रही थी।

पैदल घर जा रहे मजदूर गन्ना खाकर भर रहे पेट

लॉकडाउन के चौथे दिन शुक्रवार सुबह 8:15 बजे लखीमपुर खीरी के चौपहरा चौराहे पर केवल एक दूध विक्रेता और एक फल का ठेला ही नजर आया। बाइक सवार एक दो लोग सड़कों पर आना-जाना कर रहे थे, लेकिन मेन रोड चौराहे पर सन्नाटा पसरा रहा।

….बॉर्डर सील, खाली चल रही हैं बसें, सड़कों पर सैकड़ों पैदल चलते लोग। लॉकडाउन के दौरान गुरुग्राम, गाजियाबाद, नोएडा की सीमाएं तो सील कर दी गई हैं, लेकिन पलायन करती भीड़ को सहूलियत के नाम पर पैदल सीमाओं को लांघने की इजाजत है।
हैरत की बात तो यह है कि बसें सड़कों पर दिख भी रही हैं तो बॉर्डर तक भी पहुंचने के लिए इन बसों में सफर करने की इजाजत नहीं है। डीटीसी-क्लस्टर ड्राइवर कंडक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष चांद बाबू गोला ने कहा कि अभी भी सड़कों पर खाली बसें दौड़ रही हैं।

लेकिन इन बसों में केवल जरूरी कार्यों के लिए आने जाने वाले कर्मियों को आईडी कार्ड दिखाने के बाद ही आने जाने की इजाजत दी जा रही हैं। एसोसिएशन के अध्यक्ष का कहना है कि लॉकडाउनके दौरान लगी पाबंदी के बाद आखिरकार यात्रियों की सुविधा में इस्तेमाल होने वाली बसें खाली होने के बावजूद जनसैलाब पैदल है और बसें खाली।

इससे न तो संक्रमण पर शिकंजा कसेगा और न ही सरकार की आय में बढ़ोतरी होगी। अंतरराज्जीय बसों का अगर संचालन होने की वजह से दूसरे शहरों के लिए नहीं पहुंच पा रहे हैं।

ऐसे में दिहाड़ीदार श्रमिक अपने परिवार के साथ रोटी के लिए अब अपने गांव के लिए पलायन कर रहे हैं। आगे सैकड़ों किलोमीटर का पैदल चलने के जज्बे के साथ आगे बढ़ने वाले दिल्ली की सीमाओं पर भी पैदल चलने को विवश है।

लॉकडाउन: नहीं मिली बस तो ठेलों पर सवार होकर ही चल दिए दिल्ली से आरा-पटना

यह कोरोना वायरस के संक्रमण से भागने वाली भीड़ नहीं है बल्कि मजबूरों की भीड़ है। हमारे पास खाने के पैसे नहीं हैं। अपने गांव जाएंगे तो कम से कम गुजारा तो चला लेंगे। लॉकडाउन के बाद पास में रखे पैसे खत्म हो गए। काम बंद है। कमाई खत्म हो गई है। ऐसे में घर का किराया कैसे देंगे? पेट कैसे पालेंगे? कुछ यही कहना है कि उन मजदूरों का, जो किसी तरह दिल्ली से करीब 1000 किलोमीटर दूर आरा-पटना और इससे भी आगे जाने के लिए ठेले पर निकल पड़े हैं। 12 ठेलों पर बारी बारी से सवार होकर 40 लोग अपने गांव-घर की ओर निकल पड़े हैं।

शुक्रवार को एनएच-24 का नजारा देखने लायक रहा। सड़क के किनारे सैकड़ों मजदूरों की भीड़ टोलियों में नजर आईं। शुक्रवार की भीड़ में ऐसे लोग भी शामिल रहे, जो कि बसों की व्यवस्था होने की खबर मिलने के बाद घरों से बोरिया-बिस्तर बांध कर निकल पड़े। इस भीड़ में महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे भी बड़ी संख्या में शामिल रहे। यह सभी यूपी के अलग-अलग शहरों में जाने के लिए घरों से निकल पड़े हैं। बस नहीं मिलने पर सब पैदल ही घर की ओर बढ़ रहे हैं।

इक्का दुक्का बसें, किराया एक हजार

छिजारसी कट पर बस के इंतजार में खड़े लोगों ने बताया कि दो बसें यूपी के दूसरे शहरों के लिए निकली। इसमें एक निजी बस भी थी। एक निजी बस हरदोई के लिए निकल रही है। उसके चालक-परिचालक एक व्यक्ति का किराया एक हजार रुपये मांग रहे थे। उन्होंने बताया कि बसों के चालक कहीं भी जाने के लिए एक हजार रुपये से कम पर नहीं मान रहे थे।

सरकारी घोषणाओं पर नहीं है भरोसा

जब उनसे सरकारी घोषणाओं और मदद की बात कही गई तो उन्होंने बताया कि अभी तक उनके पास कोई भी ऐसा नहीं आया है जो कि राशन और जरूरत का सामान पहुंचाने का वादा करे। ऐसे में सरकारी घोषणाओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। अभी निकलने का समय बचा हुआ है लिहाजा गांव की ओर निकल रहे हैं।

पूरी रात दिल्ली और आसपास से निकले लोग

दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों से पूरी रात लोग अपने घर और गांव की ओर पैदल ही हजारों किलोमीटर के लिए निकलते देखे गए। रात में बारिश होने के बावजूद यह भीड़ थमी नहीं। अभी तक बड़ी तादाद में में ऐसे मजदूर पैदल ही दिल्ली से निकल चुके हैं। मजदूर लगातार घर जा रहे हैं।

कारखाने में ही रहते थे, निकाल दिया

कुछ मजदूरों का कहना है कि वह कारखाने में ही रहते थे, लेकिन कोरोना वायरस के संक्रमण के खौफ के बीच उनको कंपनी ने निकाल दिया गया। ऐसे में उनके पास रहने को भी कोई ठौर ठिकाना नहीं बचा। जिंदगी बचाने के लिए घरों की ओर निकल पड़े।

संक्रमण से बचाव को कोई एहतियात नहीं

जो भीड़ गांवों की ओर भाग रही है उसमें कुछ लोगों ने मास्क पहन रखे थे, लेकिन ज्यादातर के पास मास्क नहीं था। एक दूसरे से दूरी का भी कोई ख्याल नहीं रखा जा रहा था। बसों में भी भारी भीड़ थी। ऐसे में कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा भी बढ़ सकता था।

भीड़ में शामिल एक मजदूर ने बताया कि मैं दिल्ली में मजदूरी करता हूं। आज सुबह पैदल ही नोएडा पहुंचा हूं। बस का इंतजार कर रहे हैं। मुझे हरदोई जाना है। रजनीश ने कहा कि हम पूरे परिवार के साथ उन्नाव जा रहे हैं। पहले जाने के बारे में सोचा नहीं था। जब पता चला कि बसों की व्यवस्था हो जाएगी तो पूरे परिवार के साथ निकल पड़े । रमाकांत ने बताया कि मैं कन्नौज जा रहा हूं। नोएडा में रहता हूं। आजकल कोई काम नहीं है। इसलिए गांव जाने को निकल पड़ा हूं। बस का इंतजार है।

Lockdown — and labour is locked out. Businesses across sectors — ecommerce to retail, and mining to manufacturing — are facing serious or even crippling labour shortage, putting yet another question mark on how India’s supply chain will hold up.

Workers returning home or not showing up for work because of transport scarcity and police violence, have led to 80-90% labour shortage for many ecommerce firms. Retailers have been hit hard too. In some big mandis, worker shortage is around 70%, and in some mines, 20% and climbing. Manufacturing units are facing the issue of contract labour keen to get back to their villages.

During an interaction with the government, industry members were told that workers who have returned home shouldn’t be called back, to reduce the probability of disease transmission, but that consumers shouldn’t suffer because of backend labour shortage.

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Author: Musing India

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