अटल बिहारी वाजपेयी

Atal Bihari Vajpaee’s memories

अटल बिहारी वाजपेयी
अटल बिहारी वाजपेयी

पिता के साथ एक ही क्लास में पढ़ते थे अटल जी, उनके जीवन से जुड़ी ये 5 बातें नहीं जानते होंगे आप

अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन से जुड़ी काफी बातें भले ही आप जानने का दावा करते हो लेकिन आपको बता दें कि उनके जीवन से जुड़ी कई ऐसी रोचक बातें हैं जिनके बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं। आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी ऐसी ही पांच मजेदार अनसुनी बातें।

अटल बिहारी वाजपेयी अपने पिता के साथ एक साथ बैठकर कानपुर के डीएवी कॉलेज में लॉ की पढ़ाई करते थे। हैरानी की बात यह थी कि दोनों एक ही क्लास में पढ़ते थे और हॉस्टल के एक ही रूम में रहते थे।जब इस बात का पता उनके दोस्तों को चला और छात्रों ने उनके बारे में बातें करना शुरू कर दिया तो दोनों ने अपने सेक्शन बदल लिए थे।

अटल बिहारी वाजपेयी ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि वह हमेशा से एक पत्रकार बनना चाहते थे, लेकिन गलती से वह राजनीति में पहुंच गए।

अटल बिहारी वाजपेयी जब भी जनसभा करते थे तो काली मिर्च और मिश्री का सेवन करते थे। उनके लिए खास मथुरा से मिश्री मंगाई जाती थी। सभा से पहले और बाद में वे इसे खाते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी को गिफ्ट पसंद नहीं थे। वे गिफ्ट परंपरा के बेहद खिलाफ थे। वे खाने-पीने के काफी शौकीन थे, इसलिए वे घर में तैयार भोजन को सबसे बड़ा तोहफा मानते थे।इसके अलावा उन्हें हिंदी सिनेमा से भी खासा लगाव था। उन्हें’उमराव जान’ फिल्म बहुत पसंद थी।

26 पार्टियों के साथ सरकार चलाने वाले वह देश के पहले प्रधानमंत्री थे। उन्होंने तीन बार इस पद की शपथ ली थी। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। अटल बिहारी वाजपेयी ने शादी नहीं की। उन्होंने एक बेटी को गोद लिया, जिसका नाम नमिता है। अटल जी की बहन ने कई बार उनकी पैंट को घर के बाहर फेंक दिया था, क्योंकि उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी थे और वो नहीं चाहते थे कि अटल जी आरएसएस की खाकी पैंट पहने।

नॉनवेज खाने के शौकीन अटल बिहारी जी को खासकर मछली खाना बहुत पसंद था। इसके अलावा अटल बिहारी वाजपेयी को गोलगप्पे खाना भी बेहद पसंद था। वाजपेयी को तीखे गोलगप्पे बहुत पसंद थे। वह गोलगप्पे वाले को ऊपर कमरे में बुलाते और गोलगप्पे खाने से पहले उसमें खूब सारी मिर्च डलवाते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण सुनने 11 किलोमीटर पैदल जाते थे कांग्रेस के ये मंत्री

दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रह चुके कांग्रेस नेता अशोक कुमार वालिया ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि वे अद्भुत क्षमता के स्वामी थे।

ऐसे व्यक्तित्व कभी-कभी ही जन्म लेते हैं। एक राजनीतिक पार्टी का हिस्सा होने के बाद भी दलगत राजनीति से ऊपर रहकर सर्वश्रेष्ठ स्तर की राजनीति कैसे की जा सकती है, इसे कोई अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन से सीख सकता है।

शुक्रवार को अटल बिहारी के प्रति अपनी भावनाएं जाहिर करते हुए वालिया ने कहा कि विपक्षी दल के नेता होने के बाद भी दिल्ली सरकार को चलाने में, उसकी किसी योजना को आगे बढ़ाने में उनकी सरकार को कभी कोई मुश्किल नहीं आई।

अपने बचपन में अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति को ताजा करते हुए अशोक कुमार वालिया ने कहा कि जब उनकी उम्र महज दस या बारह साल की थी, वे अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण सुनने पैदल ही घर से ग्यारह किलोमीटर दूर दरियागंज के रामलीला मैदान जाया करते थे।

यह अटल बिहारी वाजपेयी की भाषण शैली का असर था कि सामान्य जनता भी उनको सुनने को दौड़ पड़ती थी। उनकी वाणी में जोश था, गजब की राजनीतिक समझ थी और किसी भी विषय पर उनकी गहरी पकड़ हुआ करती थी। यही कारण है कि लोग मंत्रमुग्ध हो उन्हें सुनते थे।

पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर से कांग्रेस के विधायक रह चुके वालिया ने कहा कि उनके व्यवहार की सरलता और सबको एक साथ लेकर चलने की प्रतिबद्धता के कारण ही वे दो दर्जन पार्टियों को एक साथ लेकर अपने पूरी सरकार चलाने में सफल रहे, जबकि उनके पूर्व इस तरह के कई प्रयास पूरी तरह असफल साबित हो गए थे।

उन्होंने कहा कि 1998 में वे (अशोक कुमार वालिया) शीला दीक्षित के सरकार में मंत्री बन चुके थे। 1999 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन गई थी। यानी उसके बाद साल 2004 तक उन्हें केंद्र से अनेक मुद्दों पर लगातार सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता होती थी।

लेकिन इस बीच उन्हें कभी भी राजनीतिक कटुता नहीं देखने को मिली। सबसे ज्यादा बढ़कर तो यह कि भाजपा शासित एमसीडी के तीन अस्पतालों को जब दिल्ली सरकार के अधीन लेने की जरूरत पड़ी, तब भी कहीं कोई परेशानी नहीं हुई। इससे यह साफ होता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के लिए जनता का हित सबसे ऊपर था, वह भाजपा करे या कांग्रेस, इससे उन्हें बहुत फर्क नहीं पड़ता था।

कांग्रेस नेता वालिया

अपने बचपन में अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति को ताजा करते हुए अशोक कुमार वालिया ने कहा कि जब उनकी उम्र महज दस या बारह साल की थी, वे अटल का भाषण सुनने पैदल ही घर से ग्यारह किलोमीटर दूर दरियागंज के रामलीला मैदान जाया करते थे।

यह अटल की भाषण शैली का असर था कि सामान्य जनता भी उनको सुनने को दौड़ पड़ती थी। उनकी वाणी में जोश था, गजब की राजनीतिक समझ थी और किसी भी विषय पर उनकी गहरी पकड़ हुआ करती थी। यही कारण है कि लोग मंत्रमुग्ध हो उन्हें सुनते थे।

पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर से कांग्रेस के विधायक रह चुके वालिया ने कहा कि उनके व्यवहार की सरलता और सबको एक साथ लेकर चलने की प्रतिबद्धता के कारण ही वे दो दर्जन पार्टियों को एक साथ लेकर अपने पूरी सरकार चलाने में सफल रहे, जबकि उनके पूर्व इस तरह के कई प्रयास पूरी तरह असफल साबित हो गए थे। उन्होंने कहा कि 1998 में वे (अशोक कुमार वालिया) शीला दीक्षित के सरकार में मंत्री बन चुके थे।

1999 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन गई थी। यानी उसके बाद साल 2004 तक उन्हें केंद्र से अनेक मुद्दों पर लगातार सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता होती थी। लेकिन इस बीच उन्हें कभी भी राजनीतिक कटुता नहीं देखने को मिली।

सबसे ज्यादा बढ़कर तो यह कि भाजपा शासित एमसीडी के तीन अस्पतालों को जब दिल्ली सरकार के अधीन लेने की जरूरत पड़ी, तब भी कहीं कोई परेशानी नहीं हुई। इससे यह साफ होता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के लिए जनता का हित सबसे ऊपर था, वह भाजपा करे या कांग्रेस, इससे उन्हें बहुत फर्क नहीं पड़ता था।

अटल के 2 अविस्मरणीय किस्से, बोले- ‘मैं मंच से बोल रहा हूं या मचान से’, ‘मेरा उत्तराधिकारी चला गया’

उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब भी आते थे। उन्हें सुनने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था। ऐसा ही नजारा तब नजर आया जब वह शहर के बजरिया फील्ड में 1992 में एक जनसभा को संबोधित करने आए थे। यहां पर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने उनका मंच एक खराब ट्रक की बॉडी पर बनाया था। इससे उसकी ऊंचाई ज्यादा हो गई थी।

मंच पर चढ़ते ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं मंच से बोल रहा हूं या मचान से। उनके यह कहते ही खचाखच मैदान में ठहाके गूंजने लगे थे। बाद में लोगों ने स्थानीय भाजपा नेताओं की खूब खिंचाई की थी। इसके अलावा वह ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या के बाद वह उनके परिवार के कई कार्यक्रमों में शामिल होने शहर आए थे।

ब्रह्मदत्त की किताब का किया था विमोचन

अटल बिहारी वाजपेयी को जितना उनकी राजनीति के लिए जाना जाता है उतना ही कविताओं के लिए। पूर्व ऊर्जा मंत्री ब्रह्मदत्त द्विवेदी के बेटे और सदर विधायक मेजर सुनील दत्त द्विवेदी ने बताया कि पिता के कवि होने से दोनों में अच्छी जमती थी। पिताजी की मृत्यु के बाद उनके काव्य संकलन ‘जब हम न होंगे’ का संपादन व विमोचन अटल बिहारी वाजपेयी ने ही किया था।

मेरा उत्तराधिकारी चला गया

पूर्व ऊर्जा मंत्री ब्रह्मदत्त द्विवेदी की मौत के बाद अटल बिहारी वाजपेयी शहर आए थे। तब उनके साथ कई नेताओं का हुजूम था। इसके बाद वह उनकी तेरहवीं संस्कार में उनके गांव अमृतपुर भी गए थे। वहां उन्होंने कहा था कि आज मेरा उत्तराधिकारी चला गया।

जब बदला गया कार्यक्रम स्थल

वर्ष 2005 में अटल बिहारी वाजपेयी शहर में ब्रह्मदत्त द्विवेदी की पुण्यतिथि पर हुए कार्यक्रम में आए थे। कार्यक्रम के लिए भारतीय पाठशाला में मंच तैयार किया जा रहा था। इसी दौरान पता चला कि पूर्व प्रधानमंत्री ने घुटने का ऑपरेशन कराया है और वह भारतीय पाठशाला की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते। इसके बाद बद्री विशाल डिग्री कॉलेज में मंच तैयार किया गया। इसी दौरान जिले में हुए गंडुआ कांड (डाकू कलुआ द्वारा कई लोगों को लिटाकर ट्रैक्टर चढ़ा देने की घटना) पर उन्होंने सरकार पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि जनता पर ट्रैक्टर चढ़ रहा है सरकार और पुलिस सो रही है।

अपराध बहुल क्षेत्र में कर रहे साहित्य सेवा

फर्रुखाबाद के वरिष्ठ कवि डा. शिवओम अंबर 1980 के दशक में एक कवि सम्मेलन में शामिल होने दिल्ली गए थे। वहां मुख्य अतिथि के रूप में नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी आए थे। शिवओम अंबर ने बताया कि उन्होंने मुझसे कहा था कि फर्रुखाबाद जैसे अपराध बहुल क्षेेत्र में रह कर साहित्य की सेवा करना बड़ी बात है। इस पर शिवओम अंबर ने उन्हें संसद जैसे बड़े अपराध बहुल क्षेत्र में साहित्य की सेवा करने की बात कही थी। अंबर ने बताया इसके बाद जब वह काव्य पाठ करने गए तो उन्होंने मंच से इस बात का जिक्र किया।

वाजपेयी की ‘अटल लोकप्रियता’, किस्सा उस दिन का जब जूठा गिलास पाने की मच गई थी होड़

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का कानपुरियों के बीच जबर्दस्त क्रेज था। वह अपने कार्यकर्ताओं से निराले अंदाज में पेश आते थे। बृहस्पतिवार को जब उनके निधन की खबर आई तो उनके साथ बिताए पलों को लोगों ने सोशल मीडिया और फोन के जरिए एक दूसरे से साझा किया। इसी पलों में एक यादगार पल वर्ष 2004 में फूलबाग में भाजपा की चुनावी रैली से जुड़ा है।

फूलबाग की उस रैली में अपार भीड़ भाजपा को वोट देने के इरादे से नहीं बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी को सुनने के लिए जमा हुई थी। अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर पार्टी के कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनता में ऐसा नशा था कि हर कोई उनके पास जाना चाह रहा था। पूर्व विधायक राकेश सोनकर रैली की जनसभा के संचालक और तत्कालीन भाजपा जिला इकाई के महामंत्री रहे सुरेंद्र मैथानी सह संचालक थे। जितनी देर तक वाजपेयी का भाषण चला लोगों ने अवाक होकर सुना।

एक घंटे से अधिक समय तक अपने भाषण के दौरान उन्होंने कांच की गिलास में भरा हुआ पानी आधा पिया और आधा भरा हुआ गिलास डायस पर रख दिया। उसी के पास में अटल ने अपने गले से उतारी गई फू लों की माला भी रख दी थी। जैसे ही अटल बिहारी का भाषण खत्म हुआ और वह मंच से उतरकर सुरक्षा घेरे में चले गए। वहां मौजूद भीड़ अचानक मंच की तरफ भागने लगी। मंच पर रखे वाजपेयी की गले से उतारी गई माला पाने के लिए खींचतान शुरू हो गई।

इसके बाद डायस पर रखा वह गिलास जिसमें अटल ने पानी पीने के बाद आधा छोड़ दिया था। उस गिलास का पानी पीने के लिए कई कार्यकर्ता एक साथ लपके लेकिन वह पार्टी कार्यकर्ता मंजीत सिंह के हाथ लगा। मंजीत सिंह शास्त्री नगर में रहते हैं, इस समय वह भाजपा की जिला इकाई में पदाधिकारी हैं। मंजीत बताते हैँ कि जब उन्हें लगा कि गिलास उनके हाथ से गिर जाएगा तो उसे उन्होंने छिपा लिया।

डीएवी के पास पहरा देते गुजारी रात, नेहरू का भाषण नहीं सुन पाए

अटल बिहारी वाजपेयी को 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का भाषण न सुन पाने का बड़ा मलाल हुआ था। वह उन दिनों डीएवी कॉलेज के छात्र थे और यहीं छात्रावास में रहते थे। सुप्रसिद्ध लेखक शिवकुमार गोयल ने अटलजी से छात्र जीवन का कोई रोमांचक संस्मरण सुनाने का आग्रह किया, तो उन्होंने बताया था कि भारत विभाजन के समय कुछ शरारती तत्वों ने कानपुर को भी हिंसा की आग में झोंकने का प्रयास किया था।

हम सब छात्रावास में इकट्ठा थे। एक मोहल्ले के कुछ लोग आए कहा कि उनको पक्की खबर मिली है कि पड़ोस के मोहल्लों से हमारी बस्ती पर हमला किया जाएगा। कुछ हट्टेकट्टे किस्म के छात्रों ने आश्वासन दिया कि जाओ चैन की नींद सो, हम लोग मोर्चा लेंगे। पूरी रात हम लोग पहरा देंगे। मैं तथा अन्य छात्र पूरी रात उनके मोहल्ले में पहरा देते रहे। शरारती तत्वों को पता लग गया कि डीएवी के छात्र पहुंच चुके हैं। वे उत्तेजक नारे तो लगाते रहे। किंतु आक्रमण करने का साहस नहीं जुटा पाए। रात मोहल्ले में पहरा देते गुजारने के कारण 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि पंडित नेहरू का ऐतिहासिक भाषण रेडियो पर नहीं सुन सके।

गीत सुनकर भीग गईं गुरु गोलवलकर की आंखें

आरएसएस के प्रधान रहे माधव सदाशिव गोलवलकर गुरु जी की प्रेरणा से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। वर्ष-1956 में जनसंघ का अखिल भारतीय वार्षिक अधिवेशन फूलबाग में हुआ था। मंच पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ पंडित मौलिचंद्र शर्मा, पंडित दीनदयाल उपाध्याय आदि जनसंघ के तत्कालीन प्रमुख नेता तो विराजमान थे, परंतु अटल जी अनुपस्थित थे। मंच पर उनको न देख प्रशंसक और अनुयायी उद्वेलित-व्यथित थे। वास्तव में अटल जी अधिवेशन की व्यवस्थाओं में व्यस्त थे। समय मिलते ही वह जैसे ही मंच पर आए, कार्यकर्ताओं में हर्ष की लहर दौड़ गई।

अमृत अटल शीर्षक स्मारिका में एक और घटना का उल्लेख है कि वीएसएसडी कॉलेज में आरएसएस का शिक्षा वर्ग लगा था। उस शिक्षा वर्ग में हिस्सा लेने वाले रामलाल दीक्षित ने लिखा है कि, गुरु गोलवलकर के मंच पर विराजते ही अटल बिहारी गीत प्रस्तुत करने के लिए खड़े हो गए। गीत सुनकर सबकी आंखों में आंसू आ गए। गुरु गोलवलकर की आंखें भी भीग गईं।

यहां बीता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का बचपन, देखें पैतृक गांव का हाल

भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का पैतृक गांव बटेश्वर आज भी विकास को तरस रहा है। भाजपा सरकार में बटेश्वर के विकास को घोषणा तो हुईं, लेकिन धरातल पर अभी तक नहीं उतरीं। अनदेखी के चलते अटल बिहारी वाजपेयी का घर खंडहर हो गया है। गांव के लोगों को बिजली, पानी और यातायात जैसी समस्याओं से भी जूझना पड़ता है।

बटेश्वर आगरा से 80 किमी दूर है। फतेहपुर सीकरी के भाजपा सांसद चौधरी बाबूलाल ने गांव बटेश्वर को गोद लिया है। आदर्श गांव में शूमार होने के बाद बटेश्वर में सरकारी योजनाओं तक का लाभ नहीं मिल पाया। भाजपा सांसद गांव में बुनियादी सुविधाएं तक मुहैया नहीं करा पाए हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन के स्वर्णिम इतिहास को समेटे 25 क्रांतिकारियों का गांव है बटेश्वर, लेकिन फिर भी सरकार की उपेक्षा का शिकार हो रहा है। चौधरी बाबूलाल ने इसे गोद लिया तो गांव वालों को उम्मीद बंधी थी कि अब तो यह अफसरों की प्राथमिकता में आएगा, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा।

अधिकारियों ने घोषणा की थी कि अटल बिहारी वाजपेयी के घर को संरक्षित किया जाएगा, लेकिन हकीकत यह है कि जर्जर हो रही इस इमारत की मरम्मत तक नहीं कराई जा सकी है। उनका पुश्तैनी घर खंडहर हो गया है। गांव की और भी इमारतों को संरक्षित किए जाने और संग्रहालय बनाए जाने की बातें हुईं, पर काम नहीं हो पाया।

इस गांव की गलियां में अटल बिहारी का बचपन बीता। गांव के जिस मंदिर में उन्होने पूजा की, जिस स्कूल में भविष्य का ककहरा सीखा, उसकी भी सुध लेने वाला कोई नहीं है। गांव में आज भी पूर्व प्रधानमंत्री के रिश्तेदार राकेश वाजपेयी सहित कई लोग रहते हैं।

बटेश्वर में गमजदा अटल के बचपन की पाठशाला, सूनी गांव की गलियां

आगरा के बटेश्वर में भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की बचपन की पाठशाला भी गुरुवार को गमजदा रही। सुबह की प्रार्थना में उनकी सेहत की सलामती की दुआ की गई। शाम को उनके निधन की खबर से पाठशाला से जुड़ा हर शख्स गमजदा था। पंडित नेहरू ने अटल के भाषण पर उनके बडे़ नेता बनने के बयान की बुनियाद इसी पाठशाला में ही पड़ गई थी।

बटेश्वर निवासी श्रीकृष्ण बिहारी वाजपेयी के शिंदे की छावनी ग्वालियर स्थित घर में 25 दिसबर 1924 को जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी का बचपन बटेश्वर में बीता। 1927 में बटेश्वर के जमुना प्रसाद चतुर्वेदी ने जिस पाठशाला का निर्माण कराया था। अटल जी वहीं पर पढे़। अब यह प्राइमरी स्कूल बन गया है। परंतु पाठशाला की सीढियां और प्रार्थना सभास्थल आज भी मौजूद है।

इसी स्कूल में पढे़ और प्रधानाध्यापक बने पुत्तूलाल ने अटल जी से जुड़ी यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि अटल बचपन से साथियों का नेतृत्व करते थे। स्कूल में उनका भाषण जोरदार होता था। समवेत स्वर में काव्यपाठ कर करते थे। उनके पारिवारिक भतीजे राकेश वाजपेयी ने बताया कि छुट्टी के बाद यमुना किनारे बरगद के पेड़ के नीचे खाना खाते और खेलते कूदते थे।

अटल जी का बचपन बटेश्वर की जिन गलियों में बीता था, गुरुवार की शाम उनके निधन की खबर के साथ शोक में डूब गई। एम्स में उनकी हालत नाजुक होने पर बाह बटेश्वर में सलामती के लिए दुआओं का दौर शुरु हुआ था। निधन के साथ गम में डूबे लोग उनकी आत्म शान्ति की प्रार्थना और श्रद्धांजलि में जुट गए।

एम्स में अटल जी की हालत नाजुक होने पर बटेश्वर में उनकी पाठशाला और बिजौली में संत ब्रज किशोर दास कन्या इंटर कॉलेज में उनकी सलामती के लिए दुआ की गई। बटेश्वर में उनकी भांजी बहू गंगा देवी सुबह से सलामती के लिए रामायण का पाठ कर रही थी। शाम को उनके निधन की खबर के साथ निशब्द हो गई।

उनके पारिवारिक भतीजे रमेश बाजपेयी और उनकी पत्नी राजेश्वरी ने तुलसी पर जल चढ़ाया। उनकी दुआ भी काम नहीं आई। पारिवारिक दामाद मंगलाचरण शुक्ला अटल के परिवार की कुल देवी मां विन्धवासिनी के मंदिर में दिन भर पूजा करते रहे। बटेश्वर में साधु संतों ने ब्रह्मलाल जी मंदिर में भी पूजा पाठ किया।

6 अप्रैल 1999 में अटल बिहारी बाजपेयी ने बटेश्वर के खांद पर आगरा-इटावा वाया बटेश्वर रेल लाइन का शिलान्यास किया था। शिलान्यास का पत्थर भी अवनीश के खेत में लगा था। जिसे अब नाथूराम यादव ने खरीद लिया है। हाल के सालों में कुछ लोग पत्थर को उखाड़ने के लिए पहुंचे थे, जिन्हे किसानों ने खदेड़ दिया था। पत्थर किसानों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। किसान चाहते है कि पत्थर की जगह पर अटल बिहारी वाजपेयी विराजमान हों। मन्दिर बने तो उन्हें कोई बुराई नहीं है।

Musing India
Author: Musing India

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