अरविंद केजरीवाल

Analysis of Delhi Assembly Election 2020 result

दिल्ली के लोग बंटे नहीं, आप को एकजुट हो किया मतदान, जीत का बड़ा अंतर दिखाता है कि सभी समुदायों के मिले वोट

दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) की जीत कई मायनों में बेहद अहम है। चुनाव से पहले आम धारणा थी कि आप को केवल कामगार वर्ग तथा वंचित तबके का मत मिलता है और इसकी वजह मुफ्त बिजली, पानी, परिवहन जैसी सुविधाएं हैं। समृद्ध वर्ग के लोग भाजपा या कांग्रेस को वोट करते हैं। अब आते हैं मुद्दों पर। इन चुनावों में आखिर मुद्दे क्या थे? आप, भाजपा और कांग्रेस तीनों ने ही विकास की बात की। अगर चुनावी वादों की बात करें तो सब दलों ने मिलते जुलते से ही किए। तो फिर मतदाताओं ने एकजुट होकर केवल आम आदमी पार्टी पर ही विश्वास क्यों किया।

ओखला विधानसभा सीट से आप के अमानतुल्लाह खान ने लगभग 70 हजार वोटों से बड़ी जीत दर्ज की है। उन्हें लगभग 66 फीसदी वोट मिले। इससे साफ है कि सभी वर्ग के लोगों ने आप की विकास की राजनीति पर भरोसा किया। अमानतुल्लाह ने जीत के बाद कहा भी कि यहां जो विकास हुआ है वही जीत की सबसे बड़ी वजह है। शाहीन बाग इसी विधानसभा क्षेत्र में आता है जहां पिछले काफी समय से संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ धरना चल रहा है। अब आते हैं चांदनी चौक सीट पर। यहां कांग्रेस की हाई प्रोफाइल प्रत्याशी अलका लांबा मैदान में थीं।

अलका पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी के साथ थीं। चांदनी चौक में सभी तबके के लोग रहते हैं। यहां व्यापारी वर्ग है तो मजदूर और मध्यम वर्ग के लोग भी रहते हैं। यहां आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी प्रहलाद सिंह साहनी को करीब 66 फीसदी वोट मिले। अलका केवल पांच फीसदी तथा भाजपा के सुमन गुप्ता को 27 फीसदी वोट मिले। इसी तरह करोल बाग सीट से आप के प्रत्याशी विशेष रवि को 62 फीसदी मत मिले। उनके मुकाबले में भाजपा के योगेंद्र चंडोलिया को 32 फीसदी मत मिले।

यह कुछ उदाहरण है जिससे साफ है कि दरअसल लोग बंटे नहीं और सभी समुदायों ने आप को वोट किया। मतदाताओं ने केवल विकास के पैमाने पर ही वोट दिया। कांग्रेस तो चुनाव में ज्यादा प्रचार नहीं कर पाई। वहीं भाजपा नेताओं ने आखिर में जिस तरह की बयानबाजी की उसका कोई फायदा पार्टी प्रत्याशियों को नहीं मिल पाया।

जैसा कि जीतने पर आप नेता अरविंद केजरीवाल ने कहा भी, दिल्लीवालों ने एक नई तरह की राजनीति को जन्म दिया है, काम की राजनीति। जो पार्टी काम करेगी वही जीतेगी। यानी तीनों पार्टियों में मतदाताओं ने आजमाई हुई आप पर ही ज्यादा भरोसा किया। यहां आप सरकार का पांच साल का काम ही काम आया।

कांग्रेस के परंपरागत वोट भाजपा की तरफ खिसके

विधानसभा के चुनावों में वोट के गणित के लिहाज से सबसे ज्यादा सेंधमारी कांग्रेस के मत प्रतिशत में हुई। विशेषज्ञों का कहना है ऐसी संभावना है कि इस बार कांग्रेसी वोटरों ने अपनी धुर विरोधी पार्टी भाजपा को भी वोट दिया है। शायद यही वजह है कि भाजपा का वोट प्रतिशत पिछले सालों की तुलना में बढ़ा है।

इस चुनाव में अगर पड़े कुल वोट के प्रतिशत को हिसाब किताब करेंगे तो सब कुछ साफ हो जाएगा। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इस बार 53 फीसदी से ज्यादा मत आम आदमी पार्टी को पड़े। जबकि भाजपा का इस बार मत प्रतिशत 38 फीसदी से ज्यादा रहा। वहीं कांग्रेस का वोट प्रतिशत इस बार चार फीसदी के करीब रहा।

पिछले सालों से तुलना करें तो देखेंगे कि आम आदमी पार्टी का वोट बैंक तो बहुत हद तक एक जैसा ही है लेकिन कांग्रेस का वोट बैंक जबरदस्त तरीके से नीचे गिरा है। 2015 के चुनावों में कांग्रेस का वोट प्रतिशत दस फीसदी के करीब था। जो इस बार चार फीसदी से थोड़ा सा ज्यादा है। वहीं भाजपा का 2015 में वोट प्रतिशत 32 फीसदी से थोडा सा ज्यादा था जो इस बार बढ़कर 38 फीसदी से ज्यादा हो गया।

राजनीतिक विश्लेषक प्रो. सुनील सिंह कहते हैं कि आंकड़ों को और वोट बैंक को अगर बहुत बारीकी से देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस से खिसके हुए वोट का एक बहुत बड़ा हिस्सा या तो भाजपा में गया या फिर आप में गया हो। चूंकि आप में वोटों का प्रतिशत तकरीबन एक समान है ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि कांग्रेस के वोट प्रतिशत का एक हिस्सा भाजपा में गया होगा।

ज्यादातर वहां हारी भाजपा जहां दिए विवादित भाषण

भाजपा राजधानी में ज्यादातर उन सीटों पर चुनाव हारी है जहां उसके नेताओं ने प्रचार में अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ विवादित बयान दिए थे। इतना ही नहीं जिन 12 सीटों पर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनावी रैलियां की थी, उनमें केवल तीन सीटों पर ही भाजपा जीत हासिल कर पाई है।

शाहीन बाग के मुद्दे को योगी गरमाए रहे और उन्होंने आप पर प्रदर्शनकारियों को बिरयानी की सप्लाई का आरोप लगाया। योगी की चुनावी रैलियों के बाद भी भाजपा केवल बदरपुर, करावल नगर, रोहिणी में ही जीत हासिल कर पाई।

जनकपुरी सीट पर भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा ने प्रचार करते हुए विवादित बयान दिया था। इस सीट पर भाजपा के आशीष सूद आप के उम्मीदवार राजेश ऋषि से हार गए। वर्मा ने अपने बयान में कहा था कि जो कश्मीर व कश्मीरी पंडितों के साथ हुआ, वह दिल्ली में भी हो सकता है। शाहीन बाग में लाखों लोग जमा हो गए हैं, वह आपकी बहन बेटियों से दुष्कर्म करेंगे।

केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने रिठाला सीट पर चुनावी रैली करते हुए देश के गद्दारों को गोली मारो…का बेहद विवादित बयान दिया। यहां भाजपा उम्मीदवार मनीष चौधरी को आप के मोहिंदर गोयल ने हरा दिया। भारत बनाम पाकिस्तान बयान देने वाले कपिल मिश्रा भी मॉडल टाउन सीट पर हार गए। -एजेंसी

भाजपा को अब बिहार-बंगाल की चिंता, नीतीश से मोलभाव की स्थिति नहीं, सिर्फ 16 राज्यों में बची

महाराष्ट्र, झारखंड के बाद अब दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद भाजपा के सामने अब अगले एक साल में बिहार और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की चुनौती है। दिल्ली में हार के बाद भाजपा बिहार में जदयू से मोलभाव करने की स्थिति में नहीं है। वहीं पश्चिम बंगाल में पार्टी को स्थानीय स्तर पर कद्दावर नेता की कमी खटकने लगी है। इस नतीजे के बाद भाजपा के सहयोगी अब पार्टी पर दबाव बनाने से नहीं चूकेंगे।

बिहार में संभवत: इसी साल अक्तूबर में तो पश्चिम बंगाल में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं। बिहार में पार्टी की योजना सहयोगी जदयू के बराबर सीट हासिल करने की थी। मगर ताजा नतीजे ने पार्टी को उलझा दिया है। राज्य में पार्टी के पास कद्दावर नेता न होने के साथ ही विधानसभा चुनावों में लगातार हार के बाद भाजपा दबाव में होगी और जदयू से बहुत अधिक मोलभाव करने की स्थिति में नहीं होगी। वैसे भी जदयू इस चुनाव से पहले ही भाजपा की तुलना में अधिक सीटें मांग रही है।

पश्चिम बंगाल ममता की चुनौती : लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बेहतरीन प्रदर्शन कर भाजपा ने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था। तब राज्य में ब्रांड मोदी का जादू चला था। हालांकि अब राज्यों में स्थानीय कद्दावर नेताओं के बिना पार्टी काम नहीं चल रहा। पार्टी की समस्या यह है कि राज्य में उसके पास सीएम ममता बनर्जी के कद के आसपास का भी कोई स्थानीय नेता नहीं है। सीएए के खिलाफ अल्पसंख्यक वर्ग की एक पार्टी के पक्ष में गोलबंदी से तृणमूल कांग्रेस की स्थिति राज्य में मजबूत हो सकती है। राज्य में 28% अल्पसंख्यक मतदाता हैं।

भाजपा पर बढ़ेगा दबाव : भाजपा के राष्ट्रवादी एजेंडे से कई सहयोगी असहज हैं। खासतौर पर सीएए, एनआरसी, एनपीआर पर जदयू, अकाली दल ने आपत्ति जताई है। अब दिल्ली के नतीजाें के बाद दलों का दबाव भाजपा पर बढ़ेगा। वैसे भी झारखंड व महाराष्ट्र के नतीजे के बाद सहयोगियों ने खुल कर राजग की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे।

मार्च 2018 में 21 राज्यों में थी एनडीए सरकार, अब सिर्फ 16 में

लोकसभा चुनाव 2019 में प्रचंड बहुमत के साथ भले भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए केंद्र में दोबारा काबिज हुआ है, लेकिन राज्यों में उसकी हार का सिलसिला रुक नहीं रहा। मार्च 2018 में 21 राज्यों में एनडीए की सरकार थी जो अब सिमटकर 16 राज्यों में ही रह गई। 2019 लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा केवल हरियाणा में सरकार बना सकी है। फिलहाल 12 राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार है।

दिसंबर 2018 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान से शुरू हुआ भाजपा की हार का सिलसिला झारखंड में भी जारी रहा। महाराष्ट्र में सहयोगी शिवसेना के साथ स्पष्ट बहुमत मिलने के बावजूद सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा।

भाजपा दफ्तर पर लगे पोस्टर, ‘हार से निराश नहीं होते’

चुनाव नतीजों के दिन भाजपा दफ्तर में लगे पोस्टरों ने सभी का ध्यान खींचा। गृहमंत्री अमित शाह की तस्वीरों के साथ लगे इन पोस्टर में लिखा था, ‘विजय से हम अहंकारी नहीं होते, हार से हम निराश नहीं होते।’ यह शायद दुर्लभ पोस्टरों में से एक है, जिसमें भाजपा ने हार की बात की है। दिल्ली चुनाव में भाजपा के जोरदार अभियान के पीछे अमित शाह की अहम भूमिका रही। दिल्ली में भाजपा के 200 से ज्यादा सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और कई मुख्यमंत्रियों ने प्रचार किया। भाजपा का मुख्य अभियान शाहीन बाग में सीएए विरोधी प्रदर्शन पर केंद्रित रहा था।

राष्ट्रवाद की चुनौती दरकिनार, विकास पर फोकस

भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली के विधानसभा चुनाव जीतने के लिए दोतरफा रणनीति बनाई थी। पहली थी केजरीवाल सरकार की उपलब्धियों में कमी ढूंढ निकालना और दूसरी थी विकास का उससे बेहतर मॉडल पेश करने की, लेकिन केजरीवाल की चतुराई के आगे न तो ये दोनों काम आईं और न ही राष्ट्रवाद का नारा।

इस रणनीति को धरातल पर उतारने के लिए पार्टी ने दिल्ली ही नहीं उत्तर प्रदेश और बिहार तक से कार्यकर्ता और नेता बुलाए थे। भाजपा के प्रचार की कमान संभाले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अपने सांसदों को भेज केजरीवाल की फ्लैगशिप योजनाओं, मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी स्कूलों की दुर्दशा वाली तस्वीर पेश करने की कोशिश की, लेकिन केजरीवाल की सोशल मीडिया टीम ने ऐसे सभी प्रचारों का तुरंत खंडन कर दिया।

भाजपा सांसदों की हर तस्वीर पर आम आदमी पार्टी ने उन स्कूलों या मोहल्ला क्लीनिक की सही स्थिति बयान की। कहीं पर स्कूल की पुरानी इमारत बंद हो चुकी थी और उसे नई इमारत में शिफ्ट कर दिया गया था या फिर मोहल्ला क्लीनिक के सामने दिख रहा कूड़े का ढेर भाजपा शासित नगर पालिका की लापरवाही का नतीजा था।

साथ ही भाजपा ने घोषणा पत्र में आम आदमी पार्टी से बेहतर और ज्यादा वादों की झड़ी लगा दी। दो रुपए किलो आटा, आयुष्मान योजना के तहत पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा, कॉलेज छात्राओं को इलेक्ट्रिक स्कूटी, स्कूल छात्राओं को मुफ्त साइकिल के अलावा बिजली और पानी पर सब्सिडी के वादे दिल्ली की जनता को आसानी से लुभा सकते थे।

हालांकि, केजरीवाल ने चालाकी दिखाई। उन्होंने कहा यदि भाजपा दिल्ली की जनता को ये सब देना चाहती है तो उससे पहले उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में इन योजनाओं में लागू करके दिखाएं, क्योंकि इन राज्यों में उसकी सरकार है। एनसीआर के नोएडा, ग्रेटर नोएडा, फरीदाबाद और गुड़गांव जैसे उप शहरों में यदि भाजपा यह सुविधाएं दे देती है, तो ही दिल्ली के लोगों को भरोसा होगा कि उन्हें भी ये सुविधाएं मिल पाएंगी।

विकास के दोनों तीर खाली जाने के बाद भाजपा के पास राष्ट्रवाद का ब्रह्मास्त्र ही बचा था। पार्टी ने बार-बार आप को नागरिकता संशोधन कानून और शाहीन बाग जैसे मुद्दों पर बहस करने की चुनौती दी और बार-बार केजरीवाल इन मुद्दों से किनारा करते रहे। हर बार उनका यही कहना था कि ये सब राष्ट्रीय मुद्दे हैं और लोकसभा चुनाव के लिए ही ठीक है। विधानसभा चुनाव में सिर्फ लोगों की जरूरतों पर चर्चा होनी चाहिए।

भाजपा नेताओं ने इसी बौखलाहट में केजरीवाल को कभी आतंकवादी करार दिया तो कभी शाहीन बाग में धरने पर बैठे लोगों को देशद्रोही, जिन्हें गोली मार दी जानी चाहिए। दिल्ली की जनता इस भड़काऊ राजनीतिक विमर्श से ऊब गई। हालांकि इससे भाजपा का कोर समर्थक वर्ग खुश था और मध्यमवर्ग का राजनीति से उदासीन एक हिस्सा भी उसके साथ आया।

इसी वजह से भाजपा का मत-प्रतिशत पिछली बार के 33 प्रतिशत से बढ़कर 38 से अधिक हो गया। लेकिन उसे यह बढ़ोतरी कांग्रेस के घटे वोट बैंक से मिली। लेकिन आम आदमी पार्टी का मत प्रतिशत अधिक नहीं घटा। इन्हीं कारणों से भाजपा अधिक सीट जीतने में नाकामयाब रही और आप को एक बार फिर धमाकेदार जीत हासिल करने में सफलता मिली।

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में ऐसे क्या बदलाव हुए जिनसे ‘आप’ को मिली प्रचंड जीत

दिल्ली में बेहतर सरकारी स्कूलों के मुद्दे पर चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी ने प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल की है। दिल्ली की जनता ने स्वीकार किया है कि यहां केजरीवाल सरकार ने वाकई स्कूलों के लिए काम किया है। चुनाव प्रचार के दौरान भी केजरीवाल समेत सभी आप नेताओं को स्कूल के मुद्दों पर दावा करते हुए देखा गया था।

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों की क्या हालत है और उनकी बेहतरी के लिए सरकार की ओर से क्या कुछ किया जा रहा है। हाल ही में दिल्ली सरकार और ब्रिटिश काउंसिल ने आपसी शैक्षिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है।

इस समझौते के पीछे का मकसद स्किल डेवलपमेंट और अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देना है। इससे पहले भी दिल्ली सरकार की ओर से कुछ ऐसे फैसले लिए गए हैं, जिनसे राजधानी की सरकारी स्कूलों की हालत सुधरने में काफी सहयोग मिला है। आइए जानते हैं दिल्ली सरकार के वो कौन से सराहनीय फैसले हैं:

ब्रिटिश काउंसिल के साथ एमओयू

दिल्ली सरकार की तरफ से दिल्ली के उप मुख्यमंत्री व शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया और ब्रिटिश काउंसिल की तरफ से डायरेक्टर एलेन गेमेल ओबीई ने सर्वोदय कन्या बाल विद्यालय, वेस्ट विनोद नगर में एक समझौता साइन किया है, जिसके माध्यम से युवाओं के स्किल डेवलपमेंट और कला-संस्कृति में सहयोग को लेकर काम किया जाएगा।

शिक्षकों को विदेश में ट्रेनिंग

दिल्ली की सरकारी स्कूलों में भी निजी स्कूलों की तरह पढ़ाई हो रही है। दिल्ली के एक हजार से अधिक सरकारी स्कूलों के शिक्षकों और प्राचार्यों को अब तक प्रशिक्षण के लिए सिंगापुर और फिनलैंड भेजा जा चुका है। वो वहां से ट्रेनिंग लेकर आते हैं और दिल्ली में पढ़ाई करवाते हैं।

स्कूल की इमारतों में हुआ काम

दिल्ली के कई सरकारी स्कूलों की दीवारों का रंग-रोगन हो चुका है और इनकी बुनियादी संरचना किसी निजी स्कूल से कम नहीं है। इससे बच्चों को साफ और बड़ी जगह में पढ़ाई का मौका मिल रहा है। इसमें बच्चों के लिए जिम, ग्राउंड, स्विमिंग पूल आदि शामिल हैं।

‘हैप्पीनेस करिकुलम’

दिल्ली के सरकारी स्कूलों के 40 अध्यापकों और शिक्षाविदों की एक टीम ने करीब छह महीने में ‘हैप्पीनेस करिकुलम’ बनाया है। इस पाठ्यक्रम के अलावा, नर्सरी से लेकर कक्षा सात तक छात्रों के लिए 45 मिनट का ‘हैप्पीनेस पीरियड’ होगा, जिसमें योग, कथावाचन, प्रश्नोत्तरी सत्र, मूल्य शिक्षा और मानसिक कसरत शामिल हैं।

बजट बढ़ाया

दिल्ली सरकार ने अपने पहले बजट भाषण में शिक्षा बजट दोगुना कर दिया था। बताया जा रहा है कि कुल बजट का 26 फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च हो रहा है।

एलमनी मीट

दिल्ली सरकार ने पहली बार सरकारी स्कूलों की एलमनी मीट करवाने का फैसला किया था। अब दिल्ली सरकार के सभी स्कूलों में एलमनी मीटिंग होगी। उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने शक्ति नगर के सरकारी स्कूल में एलमनी मीटिंग की औपचारिक शुरुआत की। इसमें 1961 के बाद इस स्कूल से पास हुए पूर्व विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया था।

Facebooktwitterredditpinterestlinkedinmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *